Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain: आचार्य पंडित आशु शर्मा

उज्जैन की पवित्र नगरी में पंडित आशु शर्मा एक प्रसिद्ध और अनुभवी ज्योतिषाचार्य के रूप में जाने जाते हैं, जो विशेष रूप से काल सर्प दोष पूजा उज्जैन के लिए श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनके द्वारा कराई जाने वाली काल सर्प दोष पूजा उज्जैन पूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न होती है, जिससे व्यक्ति के जीवन में चल रही बाधाएं, मानसिक तनाव और ग्रहों के अशुभ प्रभाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं। पंडित आशु शर्मा जी अपनी गहन ज्योतिषीय ज्ञान, वर्षों के अनुभव और सटीक मार्गदर्शन के कारण लोगों का विश्वास जीत चुके हैं, और उनके द्वारा कराई गई पूजा से अनेक लोगों को सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं।
काल सर्प दोष पूजा उज्जैन के साथ-साथ पंडित आशु शर्मा नवग्रह शांति पूजा, मंगल दोष निवारण, मंगल भात पूजा, रुद्राभिषेक, पितृ दोष निवारण और केमद्रुम दोष निवारण जैसे कई महत्वपूर्ण अनुष्ठानों को भी पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ संपन्न करते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली का गहराई से अध्ययन कर उसके अनुसार उपयुक्त पूजा और उपाय सुझाते हैं, जिससे व्यक्ति को जीवन में संतुलन, सफलता और शांति प्राप्त होती है। उनके द्वारा किए गए महामृत्युंजय जाप और दुर्गा सप्तशती पाठ विशेष रूप से स्वास्थ्य, सुरक्षा और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत लाभकारी माने जाते हैं।
पंडित आशु शर्मा न केवल पूजा-अनुष्ठानों में निपुण हैं, बल्कि वे कुंडली मिलान, जन्म पत्रिका विश्लेषण, कुम्भ विवाह और अर्क विवाह जैसे जटिल ज्योतिषीय कार्यों में भी पारंगत हैं। इसके अलावा, वे संतान प्राप्ति के लिए विशेष पूजन, वास्तु दोष निवारण, गृह शांति और व्यापार में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए भी प्रभावी उपाय प्रदान करते हैं। उनकी सरल भाषा में दी गई सलाह और व्यक्तिगत मार्गदर्शन लोगों को सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।
अगर आप उज्जैन में किसी अनुभवी और विश्वसनीय ज्योतिषाचार्य की तलाश कर रहे हैं, तो पंडित आशु शर्मा के माध्यम से कराई गई काल सर्प दोष पूजा उज्जैन आपके जीवन में सुख, शांति और सफलता के नए द्वार खोल सकती है। उनके सानिध्य में की गई पूजा न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करती है, बल्कि जीवन की समस्याओं को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है।

पूजा और अनुष्ठान जिनमे पंडित आशु शर्मा जी की विशेषज्ञता हैं:
Kaal Sarp Dosh Puja in Ujjain
उज्जैन में पंडित आशु शर्मा एक प्रसिद्ध ज्योतिषी हैं जो काल सर्प दोष पूजा का विशेष आयोजन करते हैं। उनके निर्देशन में इस पूजा का आयोजन होता है जो व्यक्ति को इस दोष से मुक्ति दिलाता है। पंडित आशु शर्मा विशेषज्ञता और विश्वासनीयता के साथ यह पूजा संपन्न करते हैं, जो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है। उनके माध्यम से यह पूजा कराने से व्यक्ति की समस्याओं में सुधार होता है और उन्हें नई ऊर्जा और संतुलन मिलता है। उनकी विशेष परामर्श सहित सहायता से लोग अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति लाते हैं।
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काल सर्प दोष पूजा
ज्योतिष में काल सर्प दोष को बहुत ही हानिकारक योग माना गया है। कहते हैं जिस व्यक्ति की कुंडली में यह काल सर्प दोष बनता हैं । जातक के पूर्वजन्म के जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है।
Read Moreमंगल दोष भात पूजा
मंगल दोष निवारण भात पूजन द्वारा एक मात्र उज्जैन में ही भात पूजन कर मंगल शांति की जाती है।
Read Moreमहामृत्युंजय जाप पूजा
महामृत्युंजय मंत्र भगवान शिव के मृत्युंजय रूप को समर्पित है। यह मंत्र मृत्यु, बीमारी, और अन्य कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।
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क्या आप जीवन में रुकावटों, दुर्भाग्य और असफलताओं से परेशान हैं? क्या आपको लगता है कि आपके ऊपर काल सर्प दोष का साया है? अगर हां, तो चिंता न करें! उज्जैन, मोक्ष की पवित्र भूमि, आपको इस दोष से मुक्ति पाने का सुनहरा अवसर प्रदान करती है। उज्जैन के प्रसिद्ध और अनुभवी पंडित आशु शर्मा के मार्गदर्शन में, आप शुद्ध विधि-विधान से काल सर्प दोष का शमन कर सकते हैं। काल सर्प दोष एक प्रमुख ज्योतिषीय धार्मिक धारणा है जो किसी व्यक्ति के जीवन में समस्याएं और अड़चनें उत्पन्न कर सकती हैं। यह दोष व्यक्ति को विभिन्न रूपों में दिक्कतों का सामना करने पर मजबूर कर सकता है, जैसे कि स्वास्थ्य समस्याएं, प्रोफेशनल संघर्ष, वित्तीय अस्थिरता और संबंधों में कठिनाइयां।
उज्जैन में पंडित आशु शर्मा एक प्रसिद्ध ज्योतिषी हैं जो काल सर्प दोष पूजा का विशेष आयोजन करते हैं। उनके निर्देशन में इस पूजा का आयोजन होता है जो व्यक्ति को इस दोष से मुक्ति दिलाता है। पंडित आशु शर्मा विशेषज्ञता और विश्वासनीयता के साथ यह पूजा संपन्न करते हैं, जो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है। उनके माध्यम से यह पूजा कराने से व्यक्ति की समस्याओं में सुधार होता है और उन्हें नई ऊर्जा और संतुलन मिलता है। उनकी विशेष परामर्श सहित सहायता से लोग अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं और अपने जीवन में सुख-शांति लाते हैं।
पंडित आशु शर्मा का अनुभव और ज्ञान उन्हें इस क्षेत्र में प्रमुख बनाता है और वे व्यक्ति के समस्याओं का निवारण करने में सक्षम होते हैं। उनकी दिशा निर्देशन में काल सर्प दोष पूजा सम्पन्न होने से व्यक्ति को अनुभव में बदलाव और समृद्धि का अनुभव होता है। काल सर्प दोष ज्योतिष शास्त्र में एक महत्वपूर्ण मान्यता है, जिसके अनुसार इस दोष के कारण व्यक्ति को जीवन में अनेक संकटों का सामना करना पड़ सकता है। यह दोष जातक के जीवन को प्रभावित करके विभिन्न तरह की मानसिक, शारीरिक, और आर्थिक समस्याओं का कारण बन सकता है। उज्जैन, मध्यप्रदेश के पवित्र स्थलों में से एक है, जहां प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं पूजा पाठ के विशेषज्ञ पंडित आशु शर्मा द्वारा काल सर्प दोष की पूजा का आयोजन किया जाता है। उनके निर्देशन और मार्गदर्शन में यह पूजा संपन्न होती है, जो व्यक्ति को इस दोष से मुक्ति दिलाती है।
पंडित आशु शर्मा की विशेष ज्ञानशक्ति, अनुभव, और शास्त्रीय ज्ञान के साथ, वे व्यक्ति की शांति और समृद्धि के माध्यम से उनकी सेवाएं प्रदान करते हैं। उनकी ध्यानपूर्वक पूजा विधि और उपायों से जातक को नई ऊर्जा, संतुलन, और समृद्धि का अनुभव होता है। काल सर्प दोष के निवारण में व्यक्ति को इस पूजा के माध्यम से अनेक समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है और वे अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की अनुभूति करते हैं। उज्जैन में पंडित आशु शर्मा द्वारा आयोजित काल सर्प दोष पूजा एक शांतिपूर्ण और उपयोगी अनुभव प्रदान करती है, जो व्यक्ति को उनकी समस्याओं का समाधान प्राप्त करने में सहायता करती है। वे न केवल धार्मिक तत्त्वों को बखूबी जानते हैं बल्कि व्यक्ति को आत्मिक शक्ति और संतोष की प्राप्ति में मदद करते हैं। पंडित आशु शर्मा के माध्यम से व्यक्ति को काल सर्प दोष पूजा का आयोजन कराने से उन्हें जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता, और सफलता का महसूस होता है।
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Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain

कालसर्प दोष को ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सबसे अशुभ दोषों में से एक माना गया है. राहु-केतु से निर्मित होने वाला ये दोष बहुत ही खराब माना गया है. मान्यता है कि जिस भी व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उसके जीवन में छोटी-छोटी चीजों को पाने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है. इसके साथ ही कुंडली में अन्य ग्रहों की अशुभ स्थिति से इस दोष का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है. ऐसा व्यक्ति परेशानियों से मुक्त नहीं हो पाता है. कोई न कोई समस्या उसे जकड़े ही रहती है.
कालसर्प दोष का कुंडली में समय रहते पता लगाकर उसका उपाय करना चाहिए. कालसर्प के बारे में मान्यता है कि ये दोष व्यक्ति को 42 वर्ष तक परेशान करता है. काल सर्प दोष निवारण की पूजा के लिए देशभर के श्रद्धालु यहां-वहां भटकते रहते हैं लेकिन सबसे आसान और सटीक पूजा मध्य प्रदेश के उज्जैन में राजाधिराज भगवान महाकाल की नगरी में होती है। यहां पूजन और महांकाल दर्शन करने मात्र से ही काल सर्प दोष का निवारण हो जाता है, इसके साथ ही आप राहु और केतु के मंत्रों का जप करें। इसके अलावा सर्प मंत्र और नाग गायत्री मंत्र का जप कर सकते हैं। काल सर्प दोष पूजा उज्जैन
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब कुंडली के सातों ग्रह पाप ग्रह राहु-केतु के मध्य आ जाएं तो कालसर्प दोष बनता है. इसी प्रकार से इस दोष के दो अन्य भेद भी बताए गए हैं. पहला उदित गोलार्द्ध कालसर्प दोष दूसरा अनुदित गोलाद्ध कालसर्प दोष. शास्त्रों में राहु और केतु को सर्प की भांति बताया गया है. सर्प की भांति ये व्यक्ति के भाग्य को जकड़ लेते हैं. राहु को सर्प का मुख और केतु इसकी पूंछ है. जिस व्यक्ति की कुंडली में ये दोष होता है, वो मृत्यु तुल्य कष्ट भोगता है. शास्त्रों में सर्प यानि सांप को काल का पर्याय माना गया है. अनंत, वासुकि, शेष पद्मनाभ, कंबल, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक और कालिया सभी नागों के देवता है. ऐसा माना जाता है कि जो कोई इनका प्रतिदिन स्मरण करता है. उसे नागों का भय नहीं रहता है और सदैव विजयी प्राप्त करता है. काल सर्प दोष पूजा उज्जैन
FAQ : आपके द्वारा पूछे गए कुछ प्रश्न

कालसर्प योग क्या है?
Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain
व्यक्ति के कर्म या उसके द्वारा किए गए कुछ पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप कालसर्प योग दोष कुंडली में होना माना जाता है। इसके अलावा, यदि व्यक्ति ने अपने वर्तमान या पिछले जीवन में सांप को नुकसान पहुंचाया हो तो भी काल सर्प योग दोष की निर्मिति होती है।हमारे मृत पूर्वजों की आत्माए नाराज होने से भी यह दोष कुंडली में पाया जाता है। संस्कृत में काल सर्प दोष द्वारा कई सारे निहितार्थ सुझाए गए है। यह अक्सर कहा जाता है कि अगर काल सर्प दोष निवारण पूजा नहीं की गयी तो, संबंधित व्यक्ति के कार्य को प्रभावित करेगा और सबसे कठिन बना देगा। कालसर्प दोष एक ज्योतिषीय स्थिति है जिसमें सभी ग्रह एक वृत्त बनाते हैं और राहु-केतु इस वृत्त के भीतर या बाहर स्थित होते हैं। यह स्थिति व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याओं का कारण बन सकती है। उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर में कालसर्प दोष निवारण के लिए विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में काल सर्प दोष को बहुत ही अशुभ माना गया है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष होता है तो व्यक्ति को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुंडली में काल सर्प दोष होने से व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रभावित होता है। इसलिए कालसर्प दोष की पूजा पूरे विधि विधान के साथ होना बेहद जरूरी है।

Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain is considered one of the most powerful Vedic remedies for individuals suffering from continuous obstacles, delays, fear, or unexplained hardships in life. According to astrology, Kaal Sarp Dosh forms when all planets in a person’s birth chart are positioned between Rahu and Ketu, creating imbalance and negative karmic effects. Performing kaal sarp puja ujjain is highly recommended because Ujjain is one of the most sacred cities of Lord Shiva, home to the revered Mahakaleshwar Jyotirlinga. The spiritual energy of this holy city enhances the effectiveness of the puja manifold. Many devotees believe that kal sarp puja ujjain performed under the guidance of an experienced priest helps remove ancestral karmic debts, stabilizes planetary energies, and brings peace, prosperity, and success. People facing repeated failures in career, marriage delays, financial instability, or health issues often turn to kaap sarp dosh pooja in ujjain as a divine solution. The puja follows strict Vedic rituals including Sankalp, Rahu-Ketu Shanti, Nag Bali, and Shiva Abhishek, which collectively neutralize the dosh. Under the expert guidance of Pt. Ashu Sharma, devotees receive a personalized puja based on their horoscope, ensuring accuracy and maximum spiritual benefit. Choosing Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain is not just a ritual; it is a life-changing spiritual process that realigns destiny and restores balance in all aspects of life.
Performing kaal sarp puja ujjain holds immense significance because Ujjain is mentioned in ancient scriptures as a powerful center for planetary remedies. The presence of Mahakaleshwar Jyotirlinga makes kal sarp puja ujjain exceptionally effective, as Lord Shiva is the ultimate controller of time and karmic cycles. When Kaal Sarp Dosh remains untreated, it may cause sudden losses, lack of growth, mental stress, relationship conflicts, and repeated setbacks despite hard work. Kaap sarp dosh pooja in ujjain is designed to pacify Rahu and Ketu and remove their malefic influence from one’s life. The rituals are performed at highly auspicious locations like Shipra River banks and sacred temples, following authentic Vedic procedures. Pt. Ashu Sharma ensures that Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain is conducted on astrologically favorable dates, increasing its success rate. The puja includes mantra chanting, homam, serpent deity worship, and offerings that symbolize surrendering negative karma to divine forces. Devotees often experience mental clarity, emotional stability, and gradual improvement in personal and professional life after completing kaal sarp puja ujjain. This sacred ritual not only removes present difficulties but also protects the future from recurring negative planetary influences, making kal sarp puja ujjain a highly recommended astrological remedy.
Many people from India and abroad travel specifically for Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain because of the city’s unmatched spiritual vibrations and authentic Vedic traditions. Unlike generic rituals, kaap sarp dosh pooja in ujjain is customized according to the native’s birth chart, type of Kaal Sarp Dosh, and planetary placements. There are several types of Kaal Sarp Dosh such as Anant, Kulik, Vasuki, Shankhpal, Padma, Mahapadma, Takshak, Karkotak, Shankhnaad, Patak, Vishdhar, and Sheshnag, each requiring specific rituals. Pt. Ashu Sharma carefully analyzes the horoscope before performing kaal sarp puja ujjain, ensuring that every step aligns with Vedic astrology principles. The puja process involves purification rituals, invocation of deities, Rahu-Ketu Shanti, Nag Puja, and concluding blessings for prosperity and peace. Those who perform kal sarp puja ujjain often report relief from long-term problems such as job instability, business losses, infertility, and legal disputes. The sacred environment of Ujjain amplifies the spiritual impact of the puja, making Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain one of the most trusted remedies for planetary afflictions. With proper guidance, devotion, and faith, this puja opens doors to positive transformation and spiritual growth.
Choosing the right priest is crucial for the success of Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain, and Pt. Ashu Sharma is widely respected for his deep knowledge of Vedic astrology and authentic ritual practices. With years of experience, he performs kaal sarp puja ujjain with complete transparency, devotion, and adherence to ancient scriptures. Devotees receive proper consultation, explanation of the dosh, and post-puja guidance to maintain positive energy in life. Kaap sarp dosh pooja in ujjain conducted by Pt. Ashu Sharma is suitable for individuals facing career blockages, repeated failures, financial stress, marriage delays, or family disputes. The puja not only removes negative planetary effects but also strengthens confidence, decision-making, and inner peace. Performing kal sarp puja ujjain at the right time under expert supervision ensures long-lasting results and divine protection. For those seeking a genuine solution to persistent life problems, Kaal Sarp Dosh Puja Ujjain offers a powerful spiritual path toward harmony and success. By combining devotion, Vedic wisdom, and the sacred energy of Ujjain, this puja becomes a transformative experience that leads to stability, prosperity, and spiritual fulfillment.
मंगल दोष, मांगलिक दोष क्या है?
मंगल दोष, मांगलिक दोष
कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं, इन्हीं दोषों में से एक है मांगलिक दोष, यह दोष जिस व्यक्ति की कुंडली में होता है वह मांगलिक कहलाता है जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के 1, 4, 7, 9, 12वें स्थान या भाव में मंगल स्थित हो तो वह व्यक्ति मांगलिक होता है।
आज भी जब किसी स्त्री या पुरुष के विवाह के लिए कुंडली मिलान किया जाता है तो सबसे पहले देखा जाता है कि वह मांगलिक है या नहीं, ज्योतिष के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मांगलिक है तो उसकी शादी किसी मांगलिक से ही की जानी चाहिए, इसके पीछे धारणाएं बनाई गई हैं।
वैदिक ज्योतिष में मंगल देव हमारे रिश्तों पर, मस्तिष्क पर आधिपत्य रखते हैं। नाड़ी ज्योतिष के अनुसार महिला जातक की पत्रिका में मंगल देव पति का प्रतिनिधि करते हैं। प्रत्येक पत्रिका के लिए मंगल की स्थिति बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। मंगल अर्थात कुज के द्वारा ही बनता है मंगल दोष।
जब भी किसी जातक/जातिका की पत्रिका में मंगल विशेष भावों से जुड़े हों या उस पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं तो वह कुज दोष से प्रभावित होगा। कुज दोष का सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव विवाह, वैवाहिक जीवन पर पड़ता है। विवाह में बाधा, वैवाहिक जीवन में कलह आदि इसके सामान्य प्रभाव है।
कभी-कभी इसका प्रभाव इतना प्रबल होता है कि वैवाहिक जीवन में विच्छेदन की स्थिति भी आ जाती है। शास्त्रों में ऐसा वर्णित हैं मांगलिक व्यक्ति का विवाह समान भाव मांगलिक व्यक्ति से ही होना उत्तम होता है। जिससे इस दोष का शमन होता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो समस्याओ का सामना करना पड़ता है।
ज्योतिष के अनुसार मांगलिक लोगों पर मंगल ग्रह का विशेष प्रभाव होता है, यदि मांगलिक शुभ हो तो वह मांगलिक लोगों को मालमाल बना देता है। मांगलिक व्यक्ति अपने जीवनसाथी से प्रेम-प्रसंग के संबंध में कुछ विशेष इच्छाएं रखते हैं, जिन्हें कोई मांगलिक जीवनसाथी ही पूरा कर सकता है इसी वजह से मंगली लोगों का विवाह किसी मंगली से ही किया जाता है।
मांगलिक दोष या कुज दोष क्या है?
यदि किसी पत्रिका के लग्न भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव, द्वादश भाव में यदि मंगल स्थित हो तो कुंडली में मंगल दोष होता है।
कौन होते हैं मांगलिक?
कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं, इन्हीं दोषों में से एक है मांगलिक दोष, यह दोष जिस व्यक्ति की कुंडली में होता है वह मांगलिक कहलाता है जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के 1, 4, 7, 9, 12वें स्थान या भाव में मंगल स्थित हो तो वह व्यक्ति मांगलिक होता है।
मांगलिक लोगों की खास बातें
मांगलिक होने का विशेष गुण यह होता है कि मांगलिक कुंडली वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूर्णनिष्ठा से निभाता है। कठिन से कठिन कार्य वह समय से पूर्व ही कर लेते हैं, नेतृत्व की क्षमता, उनमें जन्मजात होती है, ये लोग जल्दी किसी से घुलते-मिलते नहीं परन्तु जब मिलते हैं तो पूर्णतः संबंध को निभाते हैं, अति महत्वकांक्षी होने से इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता है परन्तु यह बहुत दयालु, क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते हैं, गलत के आगे झुकना इनको पसंद नहीं होता और खुद भी गलती नहीं करते।
ये लोग उच्च पद, व्यवसायी, अभिभावक, तांत्रिक, राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, इंजीनियर सभी क्षेत्रों में विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं।
क्यों नहीं मिलने चाहिए 36 गुण?
कुंडली के हिसाब से शादी करने वाले लोग लड़के और लड़की का गुण मिलान करते हैं। कुल 36 गुण होते हैं और इसमें से जितने गुण मिल जाएं उतना अच्छा माना जाता है। शादी के लिए कम से कम 18 गुण मिलना जरूरी होता है इससे कम गुण मिलना या 36 गुण मिलना सही नहीं माना जाता क्योंकि भगवान राम और माता सीता के 36 गुण मिले थे। लेकिन शादी के बाद सीताजी को रामजी का साथ बहुत कम मिला, उनका वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा, इसलिए मेरा मानना है कि अति हमेशा बहुत बुरी होती है चाहे वह गुण का मिलना ही क्यों न हो।
क्या मांगलिक की शादी गैर मांगलिक से हो सकती है?
मांगलिक लड़के और लड़की की शादी को लेकर समाज में बहुत सारे अंधविश्वास फैले हुए हैं। इसलिए लड़का या लड़की अगर मांगलिक हो तो माता-पिता के लिए उनकी शादी परेशानी का सबब बन जाती है। लेकिन आचार्य सचिन साबेसाची का कहना है कि लड़का और लड़की अगर मांगलिक हैं तो राहु, केतु और शनि की स्थिति पर निर्भर करता है कि शादी गैर मांगलिक से होगी या नहीं। लड़का अगर मांगलिक है तो उसकी शादी उस गैर मांगलिक लड़की से हो सकती है जिसके राहु, केतु और शनि दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें और बाहरवें भाव में बैठे हों, लेकिन अगर राहु, केतू और शनि इन भावों में नहीं हैं तो उसकी शादी मांगलिक से नहीं हो सकती। यूं तो ऐसे जातक का उपाय तो कुछ नहीं है लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि 28 साल के बाद मंगल का प्रभाव खत्म हो जाता है लेकिन मेरे गुरु कहते हैं कि यह ताउम्र रहता है।
मंगल भात पूजा क्या है?
मंगल मेष एवं वृश्चिक राशि के स्वामी हैं, इसलिए जिन व्यक्तिओ बहुत क्रोध आता है या मन ज्यादा अशांत रहता है उसका कारण मंगल ग्रह की उग्रता माना जाता और यह मंगल भात पूजा कुंडली में विद्धमान मंगल ग्रह की उग्रता को कम करने के लिए की जाती है, यह पूजा उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में नित्य होती है, जिसका पुण्य लाभ समस्त भक्तजन प्राप्त करते है।
मंगल भात पूजा किसके द्वारा करवाई जानी चाहिए ?
मंगल भात पूजा पूरी तरह से आपके जीवन से जुडी हुयी है इसलिए इस पूजा को विशिस्ट, सात्विक और विद्वान ब्राह्मण द्वारा गंभीरता पूर्वक करवानी चाहिए, पंडित श्री रमाकांत चौबे जी को इस पूजा का महत्त्व और विधि भली भांति से ज्ञात है और अभी तक इनके द्वारा की गयी पूजा गयी पूजा भगवान शिव की कृपा से सदैव सफल हुयी है।
मंगल भात पूजा क्यों करवानी चाहिए?
कुछ व्यक्ति ऐसे होते है जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है उसी को ज्योतिष की भाषा में मंगल दोष कहते है, मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल के द्वारा बनाए जाने वाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, तो वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ अवश्य करवाए, जैसा की उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है इस लिए मंगल दोष को निवारण के लिए मंगल भात पूजा को उज्जैन में ही करवाने से अभीस्ट पुण्य एवं फल प्राप्त होता है.
मंगल भात पूजा किसको करवानी चाहिए ?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है अथवा इसी को मंगल दोष भी कहते है. यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है, ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. अर्थात यदि वर और वधु दोनों ही मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दूसरे से के योग से समाप्त हो जाते है. किन्तु अगर ऐसा किसी कारण से ज्ञात नहीं हो पाता है, और किसी एक की कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगल भात पूजा अवस्य करवा लेनी चाहिए. मंगल दोष एक ऐसी विचित्र स्थिति है, जो जिस किसी भी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जैसे संबंधो में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है. मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, आपको वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित करने के लिए उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में यह पूजा करवानी चाहिए।
मंगल भात पूजा की कथा:-
शास्त्रों में मंगल को भगवान शिव के शरीर से क्रोध के कारण निकले पशीने से उत्पन्न माना जाता है, इसकी कथा इस प्रकार से है, भगवान शिव वरदान देने में बहुत ही उदार है, जिसने जो माँगा उसे वो दे दिया लेकिन जब कोई उनके दिए वरदान का दुरूपयोग करता है जो प्राणिओ के कल्याण के भगवान् शिव स्वयं उसका संघार भी करते है, स्कन्ध पुराण के अनुसार उज्जैन नगरी में अंधकासुर नामक दैत्य ने भगवान् शिव की अडिग तपस्या की और ये वरदान प्राप्त किया कि मेरा रक्त भूमि पर गिरे तो मेरे जैसे ही दैत्य उत्पन्न हों जाए। भगवान शिव तो है ही अवढरदानी दे दिया वरदान, परन्तु इस वरदान से अंधकासुर ने पृथ्वी पर त्राहि-त्राहि मचा दी..सभी देवता, ऋषियों, मुनियो और मनुष्यो का वध करना शुरू कर दिया…सभी देवगढ़, ऋषि-मुनि एवं मनुष्य भगवान् शिव के पास गए और सभी ने ये प्रार्थना की- आप ने अंधकासुर को जो वरदान दिया है, उसका निवारण करे, इसके बाद भगवान शिव जी ने स्वयं अंधकासुर से युद्ध करने और उसका वध का निर्णय लिया । भगवान् शिव और अंधकासुर के बीच आकाश में भीषण युद्ध कई वर्षों तक चला ।
युद्ध करते समय भगवान् शिव के ललाट से पसीने कि एक बून्द भूमि के गर्भ पर गिरी, वह बून्द पृथ्वी पर मंगलनाथ की भूमि पर गिरी जिससे भूमि के गर्भ से शिव पिंडी की उत्पत्ति हुई और इसी को बाद में मंगलनाथ के नाम से प्रसिद्दि प्राप्त हुयी। युद्ध के समय भगवान् शिव का त्रिसूल अंधकासुर को लगा, तब जो रक्त की बुँदे आकाश में से भूमि के गर्भ पर शिव पुत्र भगवान् मंगल पर गिरने लगी, तो भगवान् मंगल अंगार स्वरूप के हो गए । अंगार स्वरूप के होने से रक्त की बूँदें भस्म हो गयीं और भगवान् शिव के द्वारा अंधकासुर का वध हो गया । भगवान् शिव मंगलनाथ से प्रसन्न होकर २१ विभागों के अधिपति एवं नवग्रहों में से एक गृह की उपाधि दी ।
शिव पुत्र मंगल उग्र अंगारक स्वभाव के हो गए.. तब ब्रम्हाजी, ऋषियों, मुनियो, देवताओ एवं मनुष्यों ने सर्व प्रथम मंगल की उग्रता की शांति के लिए दही और भात का लेपन किया, दही और भात दोनो ही पदार्थ ठन्डे होते है, जिससे मंगल ग्रह की उग्रता की शांति होती हैं। इसी कारण जिन प्राणिओ की कुंडली में मंगल ग्रह अतिउग्र होता है उनको मंगल भात पूजा करवानी चाहिए, इस पूजा का उज्जैन में करवाने के कारण यह अत्यंत लाभदायी और शुभ फलदायी होती है। इसी कारण मंगल गृह को अंगारक एवं कुजनाम के नाम से भी जाने जाते है ।
अर्क विवाह क्या है?
पुरुषों के विवाह में आ रहे विलम्ब या अन्य दोषो को दूर करने के लिए किसी कन्या से विवाह से पूर्व उस पुरुष का विवाह सूर्य पुत्री जो की अर्क वृक्ष के रूप में विद्धमान है से करवा कर विवाह में आ रहे समस्त प्रकार के दोषो से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, इसी विवाह पद्द्ति को अर्क विवाह कहा जाता है।
अर्क विवाह किन पुरुषों के होने चाहिए?
जिन पुरुषो की कुंडली में सप्तम भाव अथवा बारहवां भाव क्रूर ग्रहों से पीडि़त हो अथवा शुक्र, सूर्य, सप्तमेष अथवा द्वादशेष, शनि से आक्रांत हों। अथवा मंगलदोष हो अर्थात वर की कुंडली में १,२,४,७,८,१२ इन भावों में मंगल हो तो यह वैवाहिक विलंब, बाधा एवं वैवाहिक सुखों में कमी करने वाला योग होता है, ऐसे पुरुषो के माता पिता या अन्य स्नेही सम्बन्धी जनको को उस वर का विवाह पूर्व अर्क विवाह करवाना चाहिए।
कुंभ विवाह
कन्या के विवाह में आ रहे विलम्ब या अन्य दोषो को दूर करने के लिए किसी पुरुष से विवाह से पूर्व उस कन्या का विवाह कुम्भ से करवाते है क्युकी कुम्ब में भगवान विष्णु विद्धमान है से करवा कर विवाह में आ रहे समस्त प्रकार के दोषो से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, इसी विवाह पद्द्ति को कुंभ विवाह कहा जाता है।
कुम्भ विवाह किन कन्याओ का होना चाहिए
लड़की की कुंडली में सप्तम भाव अथवा बारहवां भाव क्रूर ग्रहों से पीडि़त हो अथवा शुक्र, सूर्य, सप्तमेष अथवा द्वादशेष, शनि से आक्रांत हों। अथवा मंगलदोष हो अर्थात कन्या की कुंडली में १,२,४,७,८,१२ इन भावों में मंगल हो तो यह वैवाहिक विलंब, बाधा एवं वैवाहिक सुखों में कमी करने वाला योग होता है, ऐसी कन्याओ के माता पिता या अन्य स्नेही सम्बन्धी जनको को उस कन्या का विवाह पूर्व कुम्भ विवाह अवश्य करवाना चाहिए।
कुंभ एवं अर्क विवाह की आवश्यकता
मंगलदोष एक प्रमुख दोष माना जाता रहा है हमारे कुंडली के दोषों में, आजकलके शादी-ब्याह में इसकी प्रमुखता देखि जा रही है, ऐसा माना जाता रहा है की मांगलिक दोषयुक्त कुंडली का मिलान मांगलिक-दोषयुक्त कुंडली से ही बैठना चाहिए या ऐसे कहना चाहिए की मांगलिक वर की शादी मांगलिक वधु से होनी चाहिए पर ये कुछ मायनो में गलत है कई बार ऐसा करने से ये दोष दुगना हो जाता है जिसके फलस्वरूप वर-वधु का जीवन कष्टमय हो जाता है लेकिन अगर वर-वधु की आयु ३० वर्ष से अधिक हो या जिस स्थान पर वर या वधु का मंगल स्थित हो उसी स्थान पर दुसरे के कुंडली में शनि-राहु-केतु या सूर्य हो तो भी मंगल-दोष विचारनीय नहीं रह जाता अगर दूसरी कुंडली मंगल-दोषयुक्त न भी हो तो. या वर-वधु के गुण-मिलान में गुंणों की संख्या ३० से उपर आती है तो भी मंगल-दोष विचारनीय नहीं रह जाता, परन्तु अगर ये सब किसी की कुंडली में नहीं है तो नव दम्पति के सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए कन्या एवं वर का कुंभ एवं अर्क विवाह करवाना अनिवार्य सा बन जाता है।
वर-वधु दोनों की कुंडलियों में मांगलिक- दोष हो तो ?
वर-वधु दोनों की कुण्डलियाँ मांगलिक- दोषयुक्त हो पर किसी एक का मंगल उ़च्च का और दुसरे का नीच का हो तो भी विवाह नहीं होना चाहिए या दोनों की कुण्डलियाँ मांगलिक- दोषयुक्त न हो पर किसी एक का मंगल 29 डिग्री से ० डिग्री के बीच का हो तो भी मंगल-दोष बहुत हद्द तक प्रभावहीन हो जाता है अतः विवाह के समय इन बातों को विचार में रख के हम आने वाले भविष्य को सुखमय बना सकते है, इस विषय में समस्त जानकारी के लिए हमें सम्पर्क करें, हमे आपके सुखमय जीवन के अवश्य प्रयास करेंगे।
रुद्राभिषेक पूजा क्या है?
भक्तो के लिए भगवान शिव के अनंत नाम है उन्ही नामों में से एक प्रसिद्ध नाम है ‘रूद्र’। और भगवान शिव का रूद्र रूप का अभिषेक ही रुद्राभिषेक कहलाता है, इस पूजन में शिवलिंग को पवित्र स्नान कराकर पूजा और अर्चना की जाती है। यह हिंदू धर्म में पूजन के शक्तिशाली रूपों में से एक है और ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव अत्यंत उदार भगवान है और बहुत ही आसानी से भक्तो से प्रसन्न हो जाते हैं।
रुद्राभिषेक कब किया जाता है ?
विधान के अनुसार रुद्राभिषेक शिवरात्रि माह में किया जाता है। लेकिन, श्रावण (जुलाई-अगस्त) का कोई भी दिन रूद्राभिषेक के लिए आदर्श रूप से अनुकूल हैं। इस पूजा का समस्त सार यजुर्वेद में वर्णित श्री रुद्रम के पवित्र मंत्र का जाप और शिवलिंग को कई सामग्रियों के द्वारा पवित्र स्नान देना है जिसमें पंचमृत या फल शहद आदि शामिल हैं।
रुद्राभिषेक क्यों करवाना चाहिए ?
संसार का हर प्राणी सुख, समृद्दि, यश, धन, वैभव और मानसिक शांति चाहता है, लेकिन क्या ये सभी को प्राप्त हो पाते है, और ऐसा भी नहीं है की ये वास्तव में अप्राप्य हो, रुद्राभिषेक के द्वारा भगवान् शिव के भक्तों को सुख समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मिलता और साथ ही कई जन्मों के किये गए जाने अनजाने पापों का प्रभाव भी नष्ट हो जाते हैं।
रुद्राभिषेक किसको करवाना चाहिए ?
जो भी प्राणी देविक, दैहिक और भौतिक तापों से पीड़ित है, जन्मकुंडली में शनि से पीड़ित है, अथवा जीवन में प्रगति के मार्ग पर चलते हुए व्यर्थ की समस्याओं और कठिनाइयों से पीड़ित है, उस व्यक्ति को इन सबसे मुक्ति प्राप्त करने के लिए भगवन शिव की शरण में जाना चाहिए और इसका सबसे उत्तम और अनुकरणीय मार्ग है रुद्राभिषेक, धर्मग्रंथों का कहना है कि रुद्राभिषेक किसी भी शुभ कर्म को करने से पहले अवस्य करवाना चाहिए, जिससे समस्त दुष्ट एवं अनिष्टकारी शक्तिया भगवन शिव की कृपा से शांत हो जाए।
रुद्राभिषेक के प्रकार:
* हर तरह के दुखों से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव का जल से अभिषेक करें|
* भगवान शिव को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूध से अभिषेक करें|
* अखंड धन लाभ व हर तरह के कर्ज से मुक्ति के लिए भगवान शिव का फलों के रस से अभिषेक करें|
* ग्रहबाधा नाश हेतु भगवान शिव का सरसों के तेल से अभिषेक करें|
* किसी भी शुभ कार्य के आरंभ होने व कार्य में उन्नति के लिए भगवान शिव का चने की दाल से अभिषेक करें|
* तंत्र बाधा नाश हेतु व बुरी नजर से बचाव के लिए भगवान शिव का काले तिल से अभिषेक करें|
* संतान प्राप्ति व पारिवारिक सुख-शांति हेतु भगवान शिव का शहद मिश्रित गंगा जल से अभिषेक करें|
* रोगों के नाश व लम्बी आयु के लिए भगवान शिव का घी व शहद से अभिषेक करें|
* आकर्षक व्यक्तित्व प्राप्ति हेतु भगवान शिव का कुमकुम केसर हल्दी से अभिषेक करें|
रुद्राभिषेक के समय उपस्थित लोगों को क्या करना चाहिए?
रुद्र अभिषेक का आयोजन सिद्ध पुजारियों या प्रकांड विद्वानों द्वारा वैदिक पध्दति से किया जाता है। इसमें शिवलिंग को उत्तर दिशा में रखते हैं। उपस्थित भक्त शिवलिंग के निकट पूर्व दिशा की ओर मुंख करके बैठते हैं। अभिषेक का प्रारम्भ गंगा जल से होता है और गंगा जल के साथ अन्य तरह के अभिषेक के बीच शिवलिंग को स्नान कराने के बाद अभिषेक के लिए आवश्यक सभी सामग्री शिवलिंग पर अर्पण की जाती है। अंत में, भगवान को विशेष व्यंजन अर्पित किए जाते हैं और आरती की जाती है। अभिषेक से एकत्रित गंगा जल को भक्तों पर छिड़का जाता है और पीने के लिए भी दिया जाता है, यह पवित्र जल सभी पाप और बीमारियां को दूर कर देता हैं। रूद्राभिषेक की संपूर्ण प्रक्रिया में उपस्थित भक्तो को मन ही मन या धीरे धीरे रूद्राम या ‘ओम नम: शिवाय’ का जाप किया जाता है।
महामृत्युंजय जाप के जीवन में क्या लाभ है?
महामृत्युंजय मंत्र वेदों में सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद का एक श्लोक है जो की भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरुप को समर्पित है, यह मन्त्र तीन स्वरूपों में है, (1) लघु मृत्युंजय मंत्र (2) महा मृत्युंजय मंत्र एवं (3) संपुटयुक्त महा मृत्युंजय मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र जप सुबह १२ बजे से पहले होना चाहिए,क्योंकि ऐसी प्राचीन मान्यता है की दोपहर १२ बजे के बाद महामृत्युंजय मंत्र के जप का उतना फल नहीं प्राप्त होता है जितना की करने वाले को प्राप्त होना चाहिए।
महा मृत्युंजय मंत्र के प्रत्येक अक्षर का अर्थ
!!ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!
त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता वर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है,स्वास्थ्य, धन, सुख में वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है, और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली उर्वारुकम= ककड़ी इव= जैसे, इस तरह बंधना= तना मृत्युर = मृत्यु से मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें मा= न अमृतात= अमरता, मोक्ष
महा मृत्युंजय मंत्र का अर्थ
समस्त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।|| इस मंत्र का विस्तृत रूप से अर्थ ||हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं,उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए.जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं.

महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख का है और लघु मृत्युंजय मंत्र का 11 लाख है. महा मृत्युंजय मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला पर सोमवार से शुरू किया जाता है. महा मृत्युंजय मंत्र को अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर शुरू किया जा सकता या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर महा मृत्युंजय मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें. अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें. इतना जप पूर्ण मनोयोग से शुद्ध उच्चरण के साथ निरंतर नहीं कर सकते इसलिए इस महामंत्र को आप विशुद्ध अंतःकरण वाले ब्राह्मण के द्वारा करवा कर समान पुण्य लाभ प्राप्त कर सकते है।
महामृत्युंजय मंत्र जप किसे करवाना चाहिए
जिन प्राणियों को ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर, कोई धार्मिक अपराध होने पर और अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या कराया जा सकता है.
महामृत्युंजय मंत्र का क्या लाभ है ?
महामृत्युंजय मंत्र शोक, मृत्यु भय, अनिश्चता, रोग, दोष का प्रभाव कम करने में, पापों का सर्वनाश करने की क्षमता रखता है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है,परन्तु ज्यादातर तो यही देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है, तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं.
महामृत्युंजय मंत्र का जाप के प्रति गलत धारणा
बहुत से पंडित महामृत्युंजय मंत्र के बारे में सिर्फ ये बताते है की इसके जाप से रोगी स्वस्थ हो जायेगा, लेकिन वास्तव में ये अर्ध सत्य है, जिससे महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार ही इतना खर्च किया. परन्तु वास्तव में इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि हे महादेव..या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो. अत: रोगी के ठीक न होने पर भी पछताना या कोसना नहीं चाहिए, जगत के स्वामी बाबा भोलेनाथ और माता पार्वती आप सबकी मनोकामना पूर्ण करें.
वास्तु दोष क्या है?
वर्तमान समय में मनुष्य के जीवन में उसके घर, कार्यालय एवं व्यावसायिक प्रतिस्थान का उसके जीवन में विशेष महत्त्व है, लेकिन कई बार स्थान के आभाव या दिशाओ की जानकारी न होने के कारण कुछ निर्माण देखने में बहुत सुन्दर प्रतीत होते है लेकिन वह किसी किसी के लिए लाभकारी सिद्द नहीं होते है, इस प्रकार की परिस्थिति का सबसे बड़ा कारण निवास करने वाले व्यक्ति का ग्रहो का भवन के वास्तु के साथ सामंजस्य न हो पाना, मह्त्वपूर्ण कार्यो जैसे अनुष्ठान, भूमि पूजन, नींव खनन, कुआं खनन, शिलान्यास, द्वार स्थापन व गृह प्रवेश आदि अवसरों पर वास्तु देव पूजा का विधान है। घर के किसी भी भाग को तोड़ कर दोबारा बनाने से वास्तु भंग दोष लग जाता है।
कैसे जानेगे आपके स्थान पर वास्तुदोष है?
आप अगर ऐसा महसूस कर रहे है की घर में अकारण ही क्लेश रहता है या फिर हर रोज कोई न कोई नुक्सान घर में होता रहता है, धन हानि व रोग आदि हो रहे हैं। किसी भी कार्य के सिरे चढ़ने में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। घर में मन नहीं लगता एक नकारात्मकता की मौजूदगी महसूस होती है। हम इस प्रतीकात्मक शक्तिओ को माने अथवा न माने लेकिन वास्तु की हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है और यह हर रोज हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा होता है।
वास्तु पूजा या वास्तु शांति पूजन
वस्तुतः हम जब की किसी नए भवन में प्रवेश करते है तो भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश अन्य सभी देवी-देवताओं की पूजा करते है, लेकिन वह भवन हमारे लिए विशेष फलदायी हो उसके लिए इनके साथ-साथ वास्तु की पूजा भी जाती हैं। वास्तु पूजन से वातावरण में फैली हुई सभी बाधाओं एवं नकारत्मक शक्तिओ को खत्म किया जा सकता है अन्यथा जीवन जीने में बाधा उतपन्न हो सकती हैं। वास्तु शांति पूजन हमे और हमारे परिवार को अनिष्ट, अनहोनी, नुकसान और दुर्भाग्य से भी बचाता है।
कैसे होती है वास्तु शांति पूजन
आप किसी भी विद्वान पंडित से इसकी सम्पूर्ण जानकारी ले सकते है, वास्तुशास्त्र में कई प्रकार की पूजन विधियां व उपाय वास्तु शांति के लिये बताये गये हैं लेकिन यह पूजन मुख्यत दो प्रकार से होते है पहली उपयुक्त पूजा की विधि द्वारा और दूसरी सांकेतिक पूजा की विधि द्वारा।
उपयुक्त पूजा
– जैसा की नाम से ही ज्ञात हो रहा है, की उपयुक्त पूजा सर्वथा उपयुक्त होती है, इसके लिये स्वस्तिवचन, गणपति स्मरण, संकल्प, श्री गणपति पूजन, कलश स्थापन, पूजन, पुनःवचन, अभिषेक, शोडेशमातेर का पूजन, वसोधेरा पूजन, औशेया मंत्रजाप, नांन्देशराद, योग्ने पूजन, क्षेत्रपाल पूजन, अग्ने सेथापन, नवग्रह स्थापन पूजन, वास्तु मंडला पूजल, स्थापन, ग्रह हवन, वास्तु देवता होम, पूर्णाहुति, त्रिसुत्रेवस्तेन, जलदुग्धारा, ध्वजा पताका स्थापन, गतिविधि, वास्तुपुरुष-प्रार्थना, दक्षिणासंकल्प, ब्राम्हण भोजन, उत्तर भोजन, अभिषेक, विसर्जन आदि प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
सांकेतिक पूजन
– सांकेतिक पूजा तब की जाती है जब समय या धन का आभाव के कारण आप उपयुक्त पूजा कराने में असमर्थ हो या किसी पूर्व निर्माण को तोड़ कर पुनर्निर्माण कराया जाता है, इस पूजन में कुछ प्रमुख क्रियाएं ही संपन्न की जाती हैं जिन्हें नजरअंदाज न किया जा सके।
लेकिन वास्तु शांति के स्थायी उपाय के लिये विद्वान पंडित जी से पूरे विधि विधान के साथ व्यक्ति को सदैव उपयुक्त पूजा ही करवानी चाहिये।
पितृदोष क्या है?
जीवन और मृत्यु एक दूसरे के साथ साथ चलते है, मनुष्य के जन्म के साथ ही उसकी मृत्यु का समय स्थान, परिस्थित सब नियत कर दिया जाता है, फिर भी कई बार सांसारिक मोह में फंसे हुए व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसका भली प्रकार से अंतिम संस्कार संपन्न ना किया जाए, या जीवित अवस्था में उसकी कोई इच्छा अधूरी रह गई हो तब भी उसकी मृत्यु के बाद उसकी आत्मा अपने घर और आगामी पीढ़ी के लोगों के बीच ही भटकती रहती है। ऐसे व्यक्तिओ के वंशजो को उनके मृत पूर्वजों की अतृप्त आत्मा ही कई बार भांति भांति के कष्ट देकर अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दबाव डालती है और यह कष्ट पितृदोष के रूप में उनके वंशजो की कुंडली में झलकता है।
इसके अतिरिक्त अगर किसी व्यक्ति अपने हाथों से जाने या अनजाने अपनी पिता की हत्या करता है, उन्हें दुख पहुंचाता या फिर अपने बुजुर्गों का असम्मान करता है तो अगले जन्म में उसे पितृदोष का कष्ट झेलना पड़ता है
पितृ दोष के लक्षण
वैसे तो इस दोष के लक्षण भी सामान्य होते है, जिनको आप चाहे तो तर्क के आधार कुछ और ही सिद्ध कर सकते है, परन्तु वास्तव में जिसकी कुंडली में यह दोष होता है, वह जनता है की वह अपने लिए कितना प्रयास कर रहा है, फिर भी सफलता न मिलने का उसे कारण समझ नहीं आ रहा, इन समस्याओ में कुछ प्रमुख समस्याएं इस प्रकार से है, जैसे विवाह ना हो पाने की समस्या, विवाहित जीवन में कलह रहना, परीक्षा में बार-बार असफल होना, नशे का आदि हो जाना, नौकरी का ना लगना या छूट जाना, गर्भपात या गर्भधारण की समस्या, बच्चे की अकाल मृत्यु हो जाना या फिर मंदबुद्धि बच्चे का जन्म होना, निर्णय ना ले पाना, अत्याधिक क्रोधी होना
ज्योतिष विद्या में भगवान सूर्य को पिता का और मंगल को रक्त का कारक माना गया है। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ये दो महत्वपूर्ण ग्रह पाप भाव में होते हैं तो व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष है ऐसा माना जाता है
पितृदोष के कुछ ज्योतिषीय कारण भी हैं, जिस व्यक्ति के लग्न और पंचम भाव में सूर्य, मंगल एवं शनि का होना और अष्टम या द्वादश भाव में बृहस्पति और राहु स्थित हो तो पितृदोष के कारण संतान होने में बाधा आती है।
अष्टमेश या द्वादशेश का संबंध सूर्य या ब्रहस्पति से हो तो व्यक्ति पितृदोष से पीड़ित होता है, इसके अलावा सूर्य, चंद्र और लग्नेश का राहु से संबंध होना भी पितृदोष दिखाता है। अगर व्यक्ति की कुंडली में राहु और केतु का संबंध पंचमेश के भाव या भावेश से हो तो पितृदोष की वजह से संतान नहीं हो पाती।
पितृ दोष निवारण पूजन
अगर आप यहाँ पर लिखी हुयी बातों को पढ़ रहे है तो आपको चिंता करने की कोई जरुरत नहीं है, आप पंडित जी को अपनी समस्या बताये और निराकरण प्राप्त करे, पंडित जी उज्जैन में एक लंबे समय से पितृ दोष शांति पूजन करवाकर अनेको पुत्रो को इस दोष से मुक्त करवा कर उनके पूर्वजो को प्रसन्न किया है।
दुर्गासप्तशती पाठ
दुर्गाजी की महीमा:-
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्।
मां दुर्गा साक्षात् शक्ति का स्वरूप है। दुर्गा देवी सदैव देवलोक, पृथ्वीलोक एवं अपने भक्तों की रक्षा करती है। दुर्गाजी संपूर्ण संसार को शक्ति प्रदान करती है। जब कोई मनुष्य किसी संकट या विपरित परिस्थितियों में फंस जाता है एवं उनकी शरण ग्रहण करता है तो वे उसे संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करती है एवं उसे समस्याओं से छूटकारा प्राप्त करने में मदद करती है। इनका पूजन-पाठ आदि बडी विधि-विधान एवं ध्यान से करना चाहिए। इसमें किसी भी प्रकार की त्रृटि होने पर हानी होने की संभावना ज्यादा रहती है। देवी दुर्गा की उपासना करने वालों को भोग एवं मोक्ष दोनो प्राप्त हो जाते है एवं दुर्गाजी साधक की सभी कामनाओं की पूर्ति करती है। मां दुर्गा की कृपा से मनुष्य दुख, क्लेश, दरिद्रता आदि से मुक्त हो जाता है।
दुर्गासप्तशती पाठ करवाने से लाभ
दुर्गासप्तशती के पाठ करवाने से परिवार में सुख-शांति आदि का वातावरण निर्मित हो जाता है।
दुर्गासप्तशती के पाठ करवाने से आकस्मिक संकट या अनहोनी की स्थिति टल जाती है।
इसके पाठ से अदालती कार्यो में सफलता मिलती है।
इसके पाठ के प्रभाव से धनहानी, ऋण आदि की निवृत्ति होती है।
आर्थिक लाभ प्राप्ति के लिए भी दुर्गासप्तशती का पाठ किया जाता है।
जीवन में यदि शत्रुओं से भय एवं समस्याएं आ रही हो तो दुर्गासप्तशती के पाठ से उनसे रक्षा होती है।
किसी अधिकारी के पद जाने की संभावना हो तो दुर्गासप्तशती पाठ से उसकी रक्षा होती है।
किसी विशेष कार्य कि सिद्धि के लिए इसका पाठ करवाना चाहिए।
दुर्गासप्तशती का पाठ करवाने से समस्त प्रकार के रोगों, भयों, दुखों कष्टों आदि से छूटकारा प्राप्त होता है।
मां दुर्गा की प्रसन्नता के लिए दुर्गासप्तशती का पाठ करवाना चाहिए।
पाठ, जाप एवं अन्य अनुष्ठान
दोष निवारणार्थ अनुष्ठान
मंगल दोष निवारण (भातपूजन), सम्पूर्ण कालसर्प दोष निवारण, नवग्रह शांति, पितृदोष शांति पूजन, वास्तु दोष शांति, द्विविवाह योग शांति, नक्षत्र/योग शांति, रोग निवारण शांति, समस्त विध्न शांति, विवाह संबंधी विघ्न शांति, नवग्रह शांति
कामना पूर्ति अनुष्ठान
भूमि प्राप्ति, धन प्राप्ति, शत्रु विजय प्राप्ति, एश्वर्य प्राप्ति, शुभ (मनचाहा) वर/वधु प्राप्ति, शीघ्र विवाह, सर्व मनोकामना पूर्ति, व्यापार वृध्दि, रक्षा कवच, अन्य सिद्ध अनुष्ठान एवं पूजन
पाठ, जाप एवं अन्य अनुष्ठान
दुर्गासप्तशती पाठ, श्री यन्त्र अनुष्ठान, कुम्भ/अर्क विवाह, गृह वास्तु पूजन, गृह प्रवेश पूजन, देव प्राण प्रतिष्ठा, रूद्रपाठ/रूद्राभिषेक, विवाह संस्कार, महामृत्युंजय जाप पूजा
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